Saturday, June 27, 2026
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A BRIEF HISTORY OF NANGELI AND HER REVOLT – नांगेली

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नांगेली
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नांगेली एक वीरांगना की कहानी

नांगेली

नांगेली का नाम केरल के बाहर शायद ही किसी ने सुना हो। किसी स्कूल के इतिहास की किताब में उनका जिक्र या कोई तस्वीर भी नहीं मिलेगी, लेकिन उनके साहस और वीरता की मिसाल ऐसी है कि एक बार जानने पर कभी नहीं भूलेंगे।
नांगेली के बारे में हर स्त्री को जानना चाहिए क्योंकि इन्होंने स्तन ढकने के अधिकार को पाने के लिए अपने ही स्तन काट दिए थे। केरल की एक ऐसी स्त्री जो तथा कथित छोटी जाति की होकर भी राजाओं के साथ अपने स्वाभिमान के लिए लड़ ली। इनकी कहानी को आज तक ना किसी ने सुनाया है और ना ही आज तक किसी ने जानने की कोशिश की है। इतिहास के पन्नों में छिपी ये लगभग सौ से डेढ़ सौ साल पुरानी कहानी है। उस समय केरल के बड़े भाग में त्रावणकोर के राजा का शासन था। ये बात तबकी है जब केरल में जातिवाद की जड़ें बहुत गहरी थीं और निचली जातियों की महिलाओं को उनके स्तन ढकने का आदेश नहीं था।
उस समय महिलाएं बिना अनुमति के अपने स्तन को नहीं ढक सकती थीं। इस बात का उल्लंघन करने पर उन्हें ‘ब्रेस्ट टैक्स‘ यानी ‘स्तन कर‘ देना पड़ता था। यदि कोई महिला स्तन कर नहीं देती थी तो उसे मार दिया जाता था। केरल में महिलाओं के साथ अत्याचार की सारी हदें पार कर दी थी। ऐसे में एक नांगेली ही थी जिन्होंने महिलाओं को इस क्रूरता से आजादी दिलाई। नांगेली ने अपने साहस और हिम्मत से सारी महिलाओं को इस अपमान से आजाद कराया। नांगेली के कारण ही महिलाओं में पहली बार ही सही लेकिन एक स्वाभिमान की चिंगारी जलने लगी थी। केरल के छेरतला में नांगेली अपने पति चिरुकंदन के साथ रहती थीं। साल 1800 में जब राजसी शासन चलता था, तब कई तरह के कर वसूले जाते थे।
ये ‘कर’ उनकी आमदनी पर केंद्रित नहीं थे बल्कि उनकी ‘नीची जाति’ यानी दलितों पर केंद्रित थे। ब्राह्मण जाति और कई अन्य तथाकथित ऊँची जाति के लोग कई विशषाधिकारों से भरा जीवन व्यतीत करते थे और साथ ही ऊँच-नीच का भेद बना रहे इस कारण कर वसूले जाते थे।

दलित जाति की महिलाओं को अपने शरीर का ऊपरी हिस्सा यानी कि अपने स्तन को ढकने की अनुमति नहीं थी और अगर वो ऐसा करती तो उनसे इस बात का कर वसूला जाता था। नांगेली एजहवा जाति की थीं। उनके समुदाय को और अन्य निचली जातियां जैसे थिया, नादर और दलित समुदायों को भी इस कर का भुगतान करना पड़ता था। इसे मुलाकरम भी कहा जाता था। कपड़ों पर सामाजिक रीति-रिवाज एक व्यक्ति की जाति की स्थिति के अनुरूप थे, जिसका मतलब था कि उन्हें केवल उनके कपड़े पहनने के तरीके से पहचाना जा सके। इस तरह स्तन-कर का उद्देश्य जाति-संरचना को बनाए रखना था। 550 रियासतों में से त्रावणकोर की इस रियासत ने भी इस कर को लगाया था।

नांगेली का साहसिक विरोध

नांगेली ने स्तन कर की बात का पुरजोर विरोध किया, उनके विरोध का तरीका था अपने शरीर को ढकना, बिना स्तन कर भरे। ऐसा कर वसूलना, ब्राह्मणिक पितृसत्ता को दर्शाता था कि केवल ब्राह्मण महिलाओं को शरीर ढकने की जरूरत है। अन्य महिलाओं का कोई अधिकार नहीं है खुद के शरीर पर क्योंकि उनकी शरीर के साथ वही किया जाता था जो ऊंची जाति के लोग चाहते थे। नांगेली ने इस बात का विरोध कर साबित किया की ये शरीर उनका है तो नियम भी उनके होंगे और इसे ढकने की इच्छा भी उनकी होगी। उस समय ये साहस तो अतुल्नीय था। जब शासकों के कर वसूलने वाले अधिकारिओं को इस विरोध के बारे में पता चला कि नांगेली किस तरह खुद को ढक कर तथाकथित ऊँची जाति व समुदाय के लोगों और उनके इस मनुवादी ढाँचे को भी चुनौती दे रहीं हैं, उन्हें पता चल गया था कि नंागेली किसी भी तरह से स्तन-कर देने से साफ मना कर रहीं हैं तब कर वसूलने नांगेली के घर जा पहुंचे। वे एक सुबह उनके स्तनों पर कर लगाने के लिए उनके पास आए। लेकिन नांगेली ने तब भी कर का भुगतान करने से इंकार कर दिया और विरोध करते हुए अपने स्तनों को काट कर एक पत्ते पर कर की तरह वसूलने वालों के सामने रख दिया। जिसके बाद नांगेली की मृत्यु बहुत खून बह जाने के कारण उसी दिन हो गई। नांगेली के पति चिरुकंदन का ये अंतहीन दुःख उन्हें बर्दाश्त नहीं हुआ, जिसके कारण चिरुकंदन ने नांगेली की जलती चिता में कूद कर अपनी भी जान दे दी, इस प्रकार देश में पहली बार कोई पुरुष सती बना।

ब्रेस्ट टैक्स का मकसद जातिवाद के ढांचे को बनाए रखना था। ये एक तरह से एक औरत के निचली जाति से होने की कीमत थी। इस कर को बार-बार अदा कर पाना इन गरीब समुदायों के लिए मुमकिन नहीं था। केरल के हिंदुओं में जाति के ढांचे में नायर जाति को शूद्र माना जाता था जिनसे निचले स्तर पर एड़वा और फिर दलित समुदायों को रखा जाता था। आज यदि महिलाएं अपने मर्जी से जीवन जी रही है तो उनका श्रेय सिर्फ नांगेली जैसी महान महिलाओं को जाता है। वह महिला जो स्वाभिमान के साथ जीना चाहती थी और दूसरी महिलाओं को भी स्वाभिमान के साथ जीना सिखा गई।

डॉ राज कुमारी बंसल डॉ राज कुमारी बंसल

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