मेरठ में एक दलित छात्रा की निर्मम हत्या के मामले ने पूरे क्षेत्र में गहरी संवेदना और आक्रोश पैदा कर दिया है। इसी कड़ी में पीड़ित परिवार को न्याय दिलाने के लिए अधिवक्ता रवि गौतम अपने साथियों के साथ कलेक्टर कार्यालय पहुंचे थे। उनका उद्देश्य केवल इतना था कि प्रशासन इस गंभीर मामले में त्वरित और निष्पक्ष कार्रवाई करे तथा दोषियों को कड़ी सजा दिलाई जाए।

हालांकि, इस दौरान कलेक्टर गेट पर प्रदर्शन और सड़क जाम की स्थिति बनने पर पुलिस ने सख्त रुख अपनाया। एसपी अविनाश पांडे के निर्देश पर अधिवक्ता रवि गौतम सहित 8 लोगों को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया, वहीं 25 अन्य लोगों के खिलाफ भी एफआईआर दर्ज की गई है। पुलिस का कहना है कि वीडियो फुटेज के आधार पर अन्य आरोपियों की पहचान की जा रही है।

लेकिन इस कार्रवाई को लेकर बहुजन समाज में भारी नाराजगी देखी जा रही है। लोगों का कहना है कि अधिवक्ता रवि गौतम कोई अपराध करने नहीं, बल्कि एक दलित बेटी को न्याय दिलाने के लिए पहुंचे थे। ऐसे में उनके साथ इस प्रकार की कार्रवाई कहीं न कहीं न्याय की आवाज को दबाने का प्रयास प्रतीत होती है।
स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं का कहना है कि जब समाज का एक जिम्मेदार नागरिक और अधिवक्ता पीड़ित परिवार के समर्थन में खड़ा होता है, तो उसे प्रोत्साहित किया जाना चाहिए, न कि जेल भेजा जाना चाहिए। यह घटना न्याय व्यवस्था और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर भी सवाल खड़े करती है।
सोशल मीडिया पर भी यह मुद्दा तेजी से उठाया जा रहा है। कई बहुजन एक्टिविस्ट्स ने खुलकर अधिवक्ता रवि गौतम का समर्थन किया है और एसपी अविनाश पांडे के इस्तीफे की मांग तक कर डाली है। लोगों का कहना है कि दोषियों पर सख्त कार्रवाई करने के बजाय न्याय की मांग करने वालों पर कार्रवाई करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या आज भी समाज में कमजोर वर्गों को न्याय पाने के लिए संघर्ष करना पड़ता है? और क्या उनकी आवाज उठाने वालों को ही निशाना बनाया जाएगा?
अब सभी की नजर प्रशासन पर टिकी है कि वह इस मामले में संतुलित और न्यायसंगत कदम उठाए, ताकि पीड़ित परिवार को न्याय मिल सके और समाज में कानून के प्रति विश्वास बना रहे।




